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सुप्रीम कोर्ट: हिरासत में लेते ही शुरू होगी 24 घंटे की गिनती, गिरफ्तारी दर्ज होने से नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज़ादी छिनते ही 24 घंटे की गिनती शुरू होगी। पुलिस औपचारिक गिरफ्तारी दिखाने में देर करके मजिस्ट्रेट के सामने पेशी नहीं टाल सकती।

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The Supreme Court of India building in New Delhi, where judges ruled on the 24-hour limit for producing detained people before a magistrate.
तस्वीर: Hindustan Times

क्या पुलिस आपको घंटों रोककर रख सकती है और बाद में कह सकती है कि "गिरफ्तारी" अब हुई? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है, नहीं। 24 घंटे की गिनती उसी पल शुरू होगी, जब आपकी आज़ादी छीनी जाती है।

क्या हुआ?

गुरुवार को जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एएस चांदुरकर की बेंच ने फैसला सुनाया कि जांच एजेंसियां गिरफ्तारी को देर से दर्ज करके लंबी हिरासत के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा से नहीं बच सकतीं। संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर नज़दीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है।

मामला त्रिपुरा के चार लोगों का था। NDPS एक्ट (नशीले पदार्थों से जुड़ा कानून) के तहत 11.03 किलो याबा टैबलेट की बरामदगी के केस में उन्हें 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे हिरासत में लिया गया, लेकिन अगले दिन सुबह 11 बजे गिरफ्तार दिखाया गया। कोर्ट ने कहा कि करीब 18 घंटे बिना न्यायिक निगरानी के रखना अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन है और उनकी तुरंत रिहाई का आदेश दिया।

यह फैसला क्यों अहम है?

उड़ीसा, केरल और मद्रास समेत कई हाईकोर्ट औपचारिक गिरफ्तारी से पहले के समय को गिनती से बाहर रखने की छूट दे रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसे "बेहद समस्याजनक और पूरी तरह अनुचित" बताया और उन फैसलों से असहमति जताई।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि "आज़ादी में अस्थायी रुकावट जैसी कोई चीज़ नहीं होती"। कोर्ट ने यह भी कहा कि तलाशी और जब्ती के लिए रोके गए व्यक्ति को भी 24 घंटे के भीतर पेश करना होगा। कोई विशेष कानून संविधान की व्याख्या का आधार नहीं बन सकता।

बेंच ने इसे हिरासत में हिंसा से भी जोड़ा। उसके मुताबिक ऐसी हिंसा अक्सर तब होती है, जब व्यक्ति को औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाए बिना रखा जाता है। कोर्ट ने भागलपुर आंखफोड़वा कांड का उदाहरण दिया।

अब क्या बदलेगा?

24 घंटे की अवधि उसी तारीख और समय से शुरू होगी, जब व्यक्ति की आज़ादी सीमित हुई, यहां तक कि जब उसे कानून लागू करने वाले अधिकारी रोकते हैं। सिर्फ मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में लगा ज़रूरी सफर का समय घटाया जा सकता है।

मजिस्ट्रेट को अब वह सटीक तारीख और समय दर्ज करना होगा, जब से व्यक्ति की आज़ादी छीनी गई, और जांचना होगा कि 24 घंटे की सीमा का पालन हुआ या नहीं। नहीं हुआ तो व्यक्ति को रिहा करना होगा।

पहले क्या हुआ था?

अनुच्छेद 22(2) 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही प्रभावी है। 1997 के डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत पर बाध्यकारी दिशानिर्देश दिए थे, ताकि हिरासत में दुर्व्यवहार रोका जा सके।

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कहानी की टाइमलाइन

24 घंटे की हिरासत सीमा पर सुप्रीम कोर्ट · 3 घटनाएँ

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  1. सुप्रीम कोर्ट: हिरासत में लेते ही शुरू होगी 24 घंटे की गिनती, गिरफ्तारी दर्ज होने से नहीं

इस ख़बर से पहले और बाद में क्या हुआ। पहले न बताई गई पृष्ठभूमि की घटनाएँ AI ने संक्षेप में लिखी हैं।

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